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भगवान शिव की कांवड़ के पीछे छिपा हुआ है एक बड़ा रहस्य, इस वजह से सावन के महीने में चढा़ई जाती है कांवड़

27 जुलाई यानि की आज से सावन का पवित्र महीने शुरू होने वाला है,परंतु ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक चंद्रग्रण की वजह से 28 से जुलाई से सावन माना जाएगा. यह महीना खासकर भगवान शिव की पूजा के  लिए बेहद ही पवित्र माना गया है. सावन के पवित्र पावन दिनों में लोग भगवान शिव की पूजा करते हैं, हर सोमवार इनका जल अभिषेक करके भगवान शिव का  व्रत रखा जाता है. इसके साथ ही कुछ लोग सावन के महीने में भगवान भोलेनाथ की कांवर लेकर आते हैं.  फिर कांवर में लाया गया जल भगवान शिव के मंदिर में चढ़ाते हैं.

 

आखिर क्यों चढ़ाते है भगवान शिव के मंदिर में कांवड़ से लाया गया जल

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सावन के महीने में कांवड़ यात्रा का बहुत ही बड़ा महत्तव माना जाता है. लोग सावन में कंवाड़ यात्रा के लिए तो चले जाते हैं परंतु क्या उन्हें पता होता है कि आखिर सावन के महीने में ही क्यों चढ़ाई जाती है भगवान शिव को कांवड़ ? इस पीछे एक भी एक राज छिपा हुआ है. एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान परशुराम ने  सबसे पहले  भगवान शिव जल अभिषेक किया था.

 

जानें  सावन के महीने में जल चढ़ाने का पूरा कारण

 

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कथा के अनुसार यह बात उस दौरान की है तब सावन का महीना चल रहा था और उसी समय समुद्र का मंथन किया जा रहा था. समुद्र मंथन के द्वारा जब विष की प्राप्ति हुई थी तो इसका ग्रहण करने से सभी ने मना कर दिया था जिसके बाद भगवान शिव ने इस विष को पी लिया था. बता दें कि उस विष का असर कम करने के लिए  माँ गांगा की मदद ली गई थी. तभी भगवान परशुराम ने भगवान शिव के जहर के असर को कम  करने के लिए गंगा से उनका अभिषेक किया था.

 

 

तभी से भगवान शिव को जल चढ़ाने की परंपरा बनी थी. सावन के महीने में भगवान शिव की कांवड़ यात्रा में देश के कोने कने से भक्त शामिल होते हैं.फिर  उसके बाद भगवान शिव के अभिषेक के लिए गंगा जल लेकर जाते हैं. इस समय भक्त नंगे पैर व केसरी रंग के वस्त्र धारण करते हैं. कांवड़ लाने के सबसे मुख्य धाम हरिद्वार,गौमुख, इलाहाबाद गंगोत्री जैसे तीर्थस्थान हैं.